देहरादून ।’’ गौवंश के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए समाज-आधारित “गौवृत्ति परिवार” की स्थापना समय की आवश्यकता है। यह बात अखिल भारतीय सह संयोजक, गौ सेवा गतिविधि श्री नवल किशोर ने तिलक रोड पर आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में कही। उन्होंने गौवंश आधारित अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने पर जोर देते हुए इसे देश के समग्र विकास से जोड़ा।
बैठक में उपस्थित गौपालकों, गौसेवकों, गौभक्तों और गौरक्षकों को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि वर्तमान में केवल लगभग 15 प्रतिशत गायें ही किसानों द्वारा पाली जा रही हैं, जबकि शेष 85 प्रतिशत का पालन गौशालाओं में सरकार और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकारें इस पर भारी बजट खर्च कर रही हैं, लेकिन गौपालन मूलतः समाज की जिम्मेदारी होनी चाहिए। श्री नवल किशोर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय समाज में गाय को सदैव सम्मान और आस्था का प्रतीक माना गया है, लेकिन वर्तमान स्थिति चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि यह न केवल सांस्कृतिक दृष्टि से, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।
उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि प्राचीन काल में गाय भारतीय अर्थव्यवस्था की धुरी रही है। ऋषि विश्वामित्र के समय से स्थापित यह व्यवस्था हजारों वर्षों तक मजबूत रही, लेकिन औपनिवेशिक काल में इसे कमजोर करने के प्रयास किए गए। 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों में भारतीय शिक्षा प्रणाली में बदलाव, भूमि अधिग्रहण कानूनों के क्रियान्वयन और गौ-आधारित अर्थव्यवस्था को समाप्त करने जैसी सिफारिशें शामिल थीं। इसी नीति के तहत भारतीयों को गौवंश से दूर करने के प्रयास हुए, कृषि में मशीनीकरण और रासायनिक खादों को बढ़ावा दिया गया तथा गौमांस के उपभोग को प्रोत्साहित किया गया। इसके परिणामस्वरूप पारंपरिक कृषि प्रणाली कमजोर हुई और भूमि की उर्वरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
श्री नवल किशोर ने कहा कि गौपालन में गिरावट के कारण किसानों की लागत बढ़ी है और रासायनिक खादों पर निर्भरता बढ़ी है, जिससे भूमि बंजर होने का खतरा बढ़ रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि गौवंश के संरक्षण के लिए ऐसे लोगों को तैयार किया जाए जो गौ-आधारित उत्पादों जैसे जैविक खाद, पंचगव्य उत्पाद आदि का उत्पादन और विपणन कर सकें। इसके लिए नगर, जिला और विकासखंड स्तर पर संगठित टोली बनाने की आवश्यकता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में गाय का विशेष स्थान है। गोपाष्टमी जैसे पर्व इसका प्रमाण हैं, जब पूरे देश में गौपूजा की जाती है। उन्होंने गौसंरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए गौपूजा, गौकथा और जनजागरण कार्यक्रमों के आयोजन पर बल दिया।
बैठक में उत्तराखंड गौसेवा संयोजक श्री धर्मवीर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग प्रचारक श्री धन्नजय, विभाग कार्यवाह देहरादून श्री अरुण, श्री जोत सिंह, ललित बडाकोटी, श्री दीपेन्द्र त्रिपाठी सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।