देहरादून । देवभूमि देहरादून में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित श्रीराम कथा के पंचम दिवस में श्रद्धालुओं को सुंदरकांड के माध्यम से भक्ति, आत्मिक जागरण और चेतना की अंतर्मुखी यात्रा के गहन आयामों से परिचित कराया गया। दिव्य गुरु आशुतोष महाराज जी के दिव्य मार्गदर्शन में कथा व्यास साध्वी दीपिका भारती ने कहा अंतरराष्ट्रीय यात्राएं बहुत हुई, इस बार चलें आत्म चेतना की कॉस्मिक यात्रा परष् और इस विषय को अत्यंत सूक्ष्म आध्यात्मिक दृष्टि से प्रस्तुत करते हुए श्रोताओं को बाहरी यात्राओं से हटाकर भीतर की यात्रा की ओर प्रेरित किया, ऐसी यात्रा, जहाँ मनुष्य स्वयं अपनी चेतना के रहस्यों से परिचित होने लगता है।
कथा का प्रारंभ माता सीता हरण के प्रसंग से हुआ। किंतु कथा व्यास ने इसे केवल एक ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि मानव जीवन की आंतरिक अवस्था के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि माता सीता उस निर्मल, शांत और दिव्य चेतना का स्वरूप हैं, जो प्रत्येक मनुष्य के भीतर विद्यमान है। जब यही चेतना अहंकार, भौतिक आकर्षण और माया रूपी लंका में बंधक बन जाती है, तब जीवन में बेचौनी, रिक्तता और विखंडन उत्पन्न होता है। ऐसे में श्रीराम का वन-वन भटक कर माता सीता की खोज करना उस परम करुणामयी सत्ता का प्रतीक है, जो मानव चेतना को पुनः उसके मूल सत्य से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहती है। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ी, हनुमान जी का दिव्य प्रवेश सम्पूर्ण वातावरण को भक्ति, शक्ति और चेतना की अद्भुत ऊर्जा से भर गया। कथा व्यास जी ने इसी प्रसंग में एक अत्यंत गूढ़ प्रश्न श्रोताओं के समक्ष रखा रावण भी यह जानने को उत्सुक था कि श्रीराम केवल एक साधारण नर हैं या स्वयं नारायण, किंतु अपने ज्ञान, सामर्थ्य और अहंकार के बावजूद वह प्रभु को पहचान नहीं पाया। वहीं हनुमान जी ने प्रथम मिलन में ही श्रीराम के दिव्य स्वरूप को अनुभव कर लिया। आखिर ऐसा क्या था जिसने एक को प्रभु के सम्मुख होकर भी अज्ञानी बनाए रखा, और दूसरे को सहज ही परमात्मा की पहचान करा दी?
उन्होंने कहा कि परमात्मा की पहचान बुद्धि, तर्क या बाहरी ज्ञान से नहीं होती; वह जागृत चेतना, विनम्रता और समर्पण से होती है। जैसे ही हनुमान जी ने श्रीराम को देखा, उनके भीतर की चेतना ने प्रभु को पहचान लिया और वे भावविभोर होकर उनके चरणों में गिर पड़े ष्प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना घ्ष्
कथा में बताया गया कि यह केवल भक्त और भगवान का मिलन नहीं था, बल्कि वह क्षण था जब आत्मा के भीतर परमात्मा की प्रत्यक्ष पहचान जागृत होती है। यही वह दिव्य अवसर था जब श्रीराम ने हनुमान जी को ब्रह्मज्ञान प्रदान किया।
कथा व्यास जी ने अत्यंत सुंदर ढंग से समझाया कि रावण और हनुमान में मूल अंतर दिव्य दृष्टि का ही था। रावण के पास बाहरी जगत का अनंत ज्ञान था लेकिन भीतर जगत में जाने वाली दिव्य दृष्टि नहीं थी। आज भी मनुष्य आध्यात्मिकता के बहुत निकट होकर भी भीतर से दूर है, क्यूंकि उसके पास दिव्य दृष्टि नहीं है। यही अंतर है ष्भगवान को माननेष् और ष्भगवान को जाननेष् में। दिव्य दृष्टि के द्वारा भगवान का दर्शन करके उन्हें जान लिया जाता है।
माता सीता की खोज हेतु वानर सेना को दसों दिशाओं में भेजे जाने के प्रसंग को अत्यंत व्यापक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया। कथा व्यास जी ने सुग्रीव की अद्भुत भौगोलिक समझ का उल्लेख करते हुए कहा कि वानर समुदाय केवल एक साधारण समूह नहीं था, बल्कि विविध क्षेत्रों, समुदायों और शक्तियों का संगठित यंत्र था। यह प्रसंग संकेत देता है कि जब उद्देश्य लोक कल्याण और धर्म की स्थापना का हो, तब प्रकृति, समाज और चेतना की अनेक शक्तियाँ स्वतः उस अभियान का हिस्सा बन जाती हैं।
दक्षिण दिशा में आगे बढ़ते हुए जब कथा लंका पहुँची, तब रावण के महल और विभीषण के निवास का अत्यंत गहन आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। कथा व्यास जी ने कहा कि स्वर्णमयी लंका भौतिक वैभव, अहंकार और बाहरी चमक का प्रतीक थी, किंतु उसी लंका के भीतर विभीषण जैसे भक्त का होना इस बात का संकेत है कि अत्यधिक भौतिकता के बीच भी आध्यात्मिक चेतना का दीप जीवित रह सकता है। यह प्रसंग आधुनिक समाज से भी गहराई से जुड़ता हुआ दिखाई दिया, जहाँ बाहरी प्रगति और सुविधाओं के बावजूद मानव भीतर से अशांत और रिक्त अनुभव कर रहा है। अशोक वाटिका में हनुमान जी और माता सीता के मिलन का प्रसंग अत्यंत भावपूर्ण रहा। किंतु इसके बाद कथा ने लंका दहन को जिस दृष्टि से प्रस्तुत किया, उसने पूरे वातावरण को गहन चिंतन में डुबो दिया।
कथा व्यास ने कहा कि हनुमान जी केवल बल और वीरता के प्रतीक नहीं थे; वे दिव्य चेतना से संचालित एक जागृत दूत थे। उन्होंने लंका में प्रवेश कर उसकी सम्पूर्ण संरचना, शक्तियों, कमजोरियों और व्यवस्था को समझा। जब उनकी पूंछ में अग्नि लगाकर उन्हें लंका की गलियों में घुमाया गया, तब भी वे भयभीत नहीं हुए, क्योंकि उनका मन निरंतर प्रभु स्मरण में स्थित था।
इसी संदर्भ में कथा में हनुमान चालीसा की पंक्ति ष्नासे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा,ष् का अत्यंत सुंदर आध्यात्मिक अर्थ बताया गया। कथा व्यास जी ने कहा कि इसका अर्थ केवल हनुमान जी का नाम जपना नहीं है, बल्कि उस अवस्था को प्राप्त करना है जिसमें स्वयं हनुमान जी स्थित थे, निरंतर प्रभु स्मरण। जब चेतना निरंतर परमात्मा से जुड़ी रहती है, तब भय, दुख, अशांति और नकारात्मकता स्वतः समाप्त होने लगती है।
कथा आगे बढ़ते हुए लंका दहन के गहन आध्यात्मिक रहस्य तक पहुँची। कथा व्यास जी ने कहा कि लंका दहन चेतना क्रांति का आरंभ था। वह अहंकार, भौतिकता और मायिक अंधकार के पतन का प्रतीक था। किंतु उसी के साथ एक नए आध्यात्मिक युग की शुरुआत भी हुई। आगे चलकर वही लंका ष्श्रीलंकाष् कहलाती है। ष्श्रीष् शब्द की व्याख्या करते हुए कथा में बताया गया कि ष्श्रीष् चेतन्य, दिव्य उपस्थिति और जागृत आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है। जहाँ परमात्मा की सत्ता प्रवेश करती है, वहाँ परिवर्तन प्रारंभ हो जाता है।
पूरे प्रवचन में दिव्य गुरु आशुतोष महाराज की शिक्षाओं की गहन झलक दिखाई दी, जो निरंतर यह संदेश देती हैं कि रामायण जीवन और चेतना में उतारने योग्य आध्यात्मिक विज्ञान है। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित यह श्री राम कथा आधुनिक मानव को उसके मानसिक तनाव, अस्तित्व संबंधी प्रश्नों और आंतरिक रिक्तता से ऊपर उठाकर आत्मिक जागरण की ओर ले जाने का एक दिव्य माध्यम बन रही है। भक्ति, दर्शन, चेतना, आध्यात्मिक रहस्यों और अंतर्मुखी अनुभवों से परिपूर्ण श्री राम कथा का पंचम दिवस प्रत्येक श्रोता को यह स्मरण करा गया कि वास्तविक यात्रा बाहर नहीं, भीतर करनी है। मधुर भजनों, कीर्तनों एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत लोक प्रस्तुतियों ने सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया, जिससे श्रद्धालु दिव्य आनंद में सराबोर हो उठे। कथा में अतिथि के रूप में बृजभूषण गैरोला (विधायक डोईवाला), लक्ष्मी कपरवाण अग्रवाल (प्रदेश प्रवक्ता भा०ज०पा० महिला मोर्चा), सुमन बुटोला (पार्षद वार्ड-90 चंद्रबनी), सुखबीर बुटोला (पूर्व पार्षद व पार्षद पति) के द्वारा दीप प्रज्वलन किया गया। सात दिवसीय श्रीराम कथा का शुभारंभ 18 मई 2026 को हुआ, जो 24 मई 2026 तक निरंतर आयोजित की जाएगी। यह दिव्य कथा प्रतिदिन सायं 5 बजे से आयोजित हो रही है।