व्यंग्य….
(डा. आशा रावत)
घुगतिन गाँ बिटि सड़क पर चार मनखियों हैं औंद झाख, जो एक बुढड़ि तै खाट पर लेकी आणा छया।
घुघूती… घुघूती… घुघूती… क्या ह्राइ काका ? तुम काकी तै इन किले ल्याणा छौ ? घुगतिन बेचैनी से पूछ।
राष्ट्रीय
क्या बोन घुगती ? य बुढड़ि द्वी दिन से तेज बुखार मा पोड़ों च। दवै देकी बि बुखार नि टुट त अब बूण बड़ा अस्पताल लेकी जाणा छौं।
य
ज़ी से जाव। बदेशी T34 कि की मा स्था शी
वो त भौत दूर च काका! बीच बीच मा बरखा अलग लगीं अर सड़क बि कतगी जगा दुटीं छन।
वी त घुगती…! जणि हम पाँच सकला किन !
अच्छा, मि देखिक औंद। जख जख रस्ता खराब होला, तुमतै बथाणू रौंलु।
तेरी भौत मेरबानी होली घुगती ! त्यारा इन रस्ता बथाण से हम पार जाण का खातिर कुछ उपाय त खोजला।
दगड़ चलदा सबि लोखोंन मूण हिलैक घुगती हैं शाबासी द्ये।
रा
येमा मेरबानी की क्या बात च काका ! हम चखुला हेकी इतगु बि नि कैर सकदा कि उड़िक ठिक रस्तों को पता करौं। तुम है। सब मनखि बि त हमारि इतगु परवा करदौ।
बोलद बोलद वा उड़ ग्ये अर मिनटों मा वापिस ऐग्ये।
वींन बथै, काका। थोड़ा अगन्या तक
त रस्ता ठिक च, पर जो सड़क अबि कुछ दिन पैलि बण है, व फीर टुट ग्ये।
हैं? वींतै त ब्याली वणै छै, व आज ही टुट ग्ये ? कैन आश्चर्य से पूछ।
क्या कन काका। सड़कों तैं मिजाण थूक लगैक चिपकांदन। जो लीसु लगैक चिपकांदा, त कुछ दिन रै जांद। कम से कम एक बरखा त वा झेल लींद।
घुगती की बात सूणिक इना माहौल मा बि मरीज सुदां सब हँसण बैगिन।
पर तुम फिकर नि कारो। वोख लोग . एखेक कैरिक पार हे जाणा छन
घुगती। हम दगड़ एक मरीज च, हां… !
सड़क जरा सी खराब हुई च। हमारि मजबूत काकी झट पार कैर देली।
फीर सबतै हँस ऐग्ये। इनी हंसदा बच्यांदा सब चलणा हैं। घुगती बि ऊंकी दगड़ उड़नी
एकन ब्वाल, पार एक गौं बिटि सड़क तक पाँचणा का बीच रस्ता मा गदन पोड़द । वोख का लोग पार जाण का वास्ता कब बिटि सरकार से विनती कना हैं, परंतु कैन
‘बड़ा बड़ा काम’
नि सूण। तब सब्यूंन अफी एक ट्रॉली लगै। वा बि ई बरखा मा दुठ ग्ये।
हां काका। मिन बि द्याख, गाँ करून वेकी मरम्मत कैरिक फीर वेतै काम लैक बणयाल। घुगतिन ब्वाल।
जो फीर टुट जाव अर कैका साथ क्ली हादसा हे जाव त वे बिचारा कु भाग।
मिन उड़दा उड़दा कति जगा इस्कुल्या नौन्याल भारि खतरनाक तरीका से गदना पार करदा देखीं। जो मी पर सत्या हूंदी त जरूर अंकी मदद करदु ।
तु मदद कनमा करदी घुगती! जो काम हम मनखियों का छन, वो हमीं त कैर सकदौ। तब किले नि करदा तुम काका! किले नि आवाज उठौंदा ! तुमारि सरकार का कन्दूड़ों मा कतई जूं नि रिंगद।
इन च घुगती कि बड़ा बड़ा काम कना का वास्ता छोटा छोटा काम छोड़ण पोड़दम। य अंकी मजबूरी च ।
कना बड़ा काम काका ?
लाटी ! पाड़ों तैं काट काटिक उंका
पुटुग सुरंग बणाण, उच्ची उच्ची जगा जाणा खुणि रोप वे लगाण, बड़ा लोखों का वास्ता मँगा हेलीकॉप्टर पाँचाण ।इतगु करोड़ों को काम छोड़िक छोटी छोटी चीज पर ध्यान कनमा जै सकद ? त्वी बथा।
रैग्ये। सुणदा रैग्ये। घुगती मूण करोलि कैरिक देखदा